सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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दीपक कुमार श्रीवास्तव


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राजनीति में स्लेजिंग – ताकि भटके सबका ध्यान

Posted On: 22 Aug, 2011  
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श्रद्धांजली

Posted On: 27 Nov, 2010  
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क्या बो रहे हो?

Posted On: 22 Nov, 2010  
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Others sports mail टेक्नोलोजी टी टी न्यूज़ बर्थ में

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ढूंढता है रात भर ……… रोटियाँ

Posted On: 16 Nov, 2010  
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Others मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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काश! मैं पाषाण होता

Posted On: 14 Nov, 2010  
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दीवाली बनाम डायन महंगाई

Posted On: 4 Nov, 2010  
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मोदी, अमिताभ बच्चन और शेष दुनिया

Posted On: 25 Oct, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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क्या हुआ मिस्टर अय्यर

Posted On: 28 Jul, 2010  
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शून्य

Posted On: 19 Jul, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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दीपक जी, अभी-अभी एक सफ़र के दौरान मेरी मुलाक़ात इंजीनियरिंग के थर्ड ईयर के एक छात्र से हुई थी, जो कोर्स कम्प्लीट करने की तैयारियों के साथ-साथ प्रशासनिक सेवा की तैयारियों के विषय में भी सोच रहा था । कारण पूछने पर उसने बताया कि अंकल जी, जब थर्ड और फ़ोर्थ ग्रेड के सरकारी कर्मचारियों की मासिक तो छोड़िये, दैनिक कमाई के आंकड़े देख रहा हूं, तो मुझे किसी भी पैकेज की अभियन्तागिरी में कोई रस दिखाई नहीं दे रहा । आखिर मां बाप इतने पैसे खर्च रहे हैं, तो उसके रिटर्न के विषय में तो मुझे सोचना ही चाहिये ! यह प्रकरण इकलौता नहीं है, अब सभी वाक़िफ़ हैं । मनमोहन सरकार इसीलिये निचली लाइनों के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल दायरे से मुक्त रखना चाहती है, क्योंकि उसे पता है कि सारी काली कमाई टू-जी स्पैक्ट्रम जैसे महाघोटालों से नहीं आती, बल्कि निचले स्तर के सरकारी दफ़्तरों में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा की गई उगाही से ऊपर तक पहुंचती है । जब वे मुक्त रहेंगे तो कुबेर का खज़ाना भी खुला रहेगा । बाक़ी लोकपाल ऊपरी स्तर पर भुस की ढेर में सुई की तलाश करते रहें, भविष्य में कोई सुराग नहीं मिलेगा । सरकार जनलोकपाल को मंज़ूरी तब तक नहीं देने वाली, जबतक अन्ना की फ़ौज़ आम जनता एक-एक को पकड़ कर बाध्य नहीं कर देती । साधुवाद ।

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के द्वारा: दीपक कुमार श्रीवास्तव दीपक कुमार श्रीवास्तव

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दीपक जी सादर वंदेमातरम ! आपने सही कहा आज जान बचाने वाला बड़ी मुश्किल से जान बख्श रहा है । अगर जान बच भी जाये तो सेविंग एकाउंट का इहलीला समाप्त हो जा रही है । स्थिति बहुत नाजुक हो गयी है । मेरे इलाहाबाद शहर में डाक्टर नाम के जीव मुझे माफ करेंगे मुझे किसी भी एमबीबीएस और एम एस/एम डी पर विश्वास नहीं रहा । कई मेरे जानपहचान वाले और करीबी इनकी सदाशयता की भेंट चढ़ चुके हैं । . लेकिन ये बेचारे भी क्या करें । एक डाक्टर तैयार होने मे कम से कम 50 लाख की रकम खर्च हो रही है । इतना पैसा इन्वेस्ट करके भी कोयी समाजसेवा करेगा तो उसे अपने सिर का इलाज करवाना पड़ेगा । सरकार को इस मकड़जाल से डाक्टरों और मरीजों को निकालने के लिये बहुत कुछ करना चाहिये । हिलाने डुलाने, झिंझोड़ने वाले लेख के लिये आभार ।

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के द्वारा: दीपक कुमार श्रीवास्तव दीपक कुमार श्रीवास्तव

आदरणीय दीपक जी सादर वंदेमातरम ! आपने भली प्रकार पाखंडी धर्मनिरपेक्षवादियों की खाल खींची । भेड़ की खाल में सब भेड़िये बैठे हैं । लेख के लिये बहुत बहुत आभार । एक जरूरी सूचना भी देना चाहता हूं छद्म नाम से टिप्पणियां करने वालों की । इधर सैयद अलीशाह गिलानी और अरूंधती राय के बीच हुये संसर्ग से एक और राष्ट्रद्रोही कूलबेबी ने जन्म लिया है । कश्मीर पर मेरे लेख ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ पर आकर उन्होंने भारतीयों को अपनी अमूल्य राय दी । नीचे दे रहा हूं । Amazing ! Kashmeer is not your matter……..It is matter of those who stay in kashmeer.I read here your comments and alike you buddies,But It appears to be double standard in your mind,what have been done by Indira gandhi is right? then you have to accept Mahmood Ghaznavi as a Great Reformer because he united India at time the various kings here fighting for their own throne….

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आप सभी के हम बहुत ही शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी परेशानी को अपनी परेशानी समझ कर साथ दिया और तब तक लड़ते रहे, जब तक कि बुराई हार ना जाये… तो देखिये हम सब की एकता की ताकत के आगे बुराई आखिर हार ही गई, अरे भाई उस चोर ने अपने ब्लॉग से इस मंच की रचनाएँ हटा ली है…तो अब हम खुश हैं और आप सभी भी हो जाइये….. इस मंच पर यहीं तो बात अच्छी लगती है कि एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है….और किसी एक का दुःख सबका होता है….ये मंच एक परिवार ही है….और भगवान से प्रार्थना है कि सभी के बीच ये स्नेह हमेशा बनाये रखे… पर हम सभी को अभी कुछ काम और करने होंगे….हमें इस समस्या का ठोस उपाय सोचना पड़ेगा ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और ये जड़ से ख़त्म हो जाये….तो चलिए मिलजुल कर कुछ सोचे…

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