सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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बोगेनविलिया

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वो
बोगेनविलिया की बेल
रहती थी उपेक्षित,
क्योंकि
थी समूह से दूर,
अलग,
अकेली एक तरफ;
छज्जे के एक कोने में
जब देती थीं
सारी अन्य लताएँ
लाल, पीले, नारंगी फूल,
वो रहती थी मौन,
सिर्फ
एक पतली-सी डंडी
कुछ पत्ते लिए हुए
काँटों के साथ.
आज सुबह से ही
हरसिंगार का पौधा
हर्ष का
मचा रहता था
शोर,
लाल, पीले, नारंगी फूल,
जा चुका था
इनका मौसम.
था
सफ़ेद,
शांत
फूलों का दौर.
तभी तो
हरसिंगार के सफ़ेद फूल
हैं प्रसन्न,
पाकर
अपना नया साथी,
क्योंकि
बोगेनविलिया की
उस उपेक्षित लता पर भी
खिल उठे थे
धवल चांदनी-से
श्वेत फूल.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditi kailash के द्वारा
June 19, 2010

सुन्दर अभिव्यक्ति……..

    deepak srivastava के द्वारा
    June 19, 2010

    प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया अदिति जी.


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