सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

29 Posts

157 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1358 postid : 12

मेरी कविता - रेल की दो टिकटें

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अथाह भीड़,
रिजर्वेशन
और टिकटें.

सदैव दो टिकटें
होती हैं
मेरी जेब में.

एक टिकट
परदेस से प्रिय तक
सफ़र कराती है,
तुमसे मिलाती है.
दूसरी
विरह की
आग सुलगाती है
विछोह के दर्द की
टीस को जगाती है
दूर,
तुमसे दूर ले जाती है.

दोनों टिकटों का फर्क
तुम्हारी आँखों में देखता हूँ.
इसीलिये
दूसरी टिकट को मैं
तुमसे छिपाकर रखता हूँ.

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditi kailash के द्वारा
June 19, 2010

सुन्दर अभिव्यक्ति……

    deepak srivastava के द्वारा
    June 19, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद अदिति जी.

atulsingh के द्वारा
June 3, 2010

good one…

    deepak srivastava के द्वारा
    June 19, 2010

    thanks for the appreciation, atul jee.

vinod chauhan के द्वारा
May 24, 2010

excellent work on modern hindi poetry and i liked it

ravi kishan के द्वारा
May 19, 2010

साफ़ शब्दों में कम शब्दों में प्यार का इजहार है. सुन्दर.

jafar ali khan के द्वारा
May 18, 2010

अच्छी लगी, सरल भाषा में सटीक अभिव्यक्ति

deepaksrivastava के द्वारा
May 18, 2010

topic of the week



latest from jagran