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सांसदों की तनख्वाह

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दैनिक जागरण के सम्पादकीय में श्रीमान राजीव शुक्ल जी को सांसदों को मिलने वाले वेतन पर दिए गए उनके विचारों से अवगत हुआ. श्रीमान के अनुसार सांसदों पर बहुत अत्याचार हो रहे हैं उनको मिलने वाले वेतन को लेकर, जोकी उनके अनुसार बहुत ही कम है और इस सम्बन्ध में वो कई विदेशी मुल्कों के सांसदों को मिलने वाले वेतन से यहाँ की तुलना करते हैं. परन्तु वे ये तुलना करना भूल जाते हैं कि हमारे मुल्क की जनता की औसत आय और उन मुल्कों की औसत आय में जमीं आसमान का अंतर है. दरअसल ये नजीर रही है कि कुछ भी हो जब सांसदों का या विधायकों का वेतन बढ़ने का प्रस्ताव हो तो ये एकजुट हो जाते हैं वैसे चाहे कोई देश के लिए कितना ही लाभप्रद प्रस्ताव हो, सिर्फ राजनीतिक कारणों से विरोध करना ही इनका धर्म हो जाता है. अच्छा होता अगर श्री शुक्ल जी एक राजनीतिक के बजाये एक सम्माननीय अख़बार के संपादक या लेखक की तरह सोचते तो उनके प्रति लोगों की श्रद्धा में वृद्धि ही होती. उम्मीद है भविष्य में उनके लेख निजी फायदों से परे होंगे.

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dheeraj soni के द्वारा
July 21, 2010

हम आपके विचार से पूर्ण-रूपेण सहमत है.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
June 25, 2010

दीपक जी जो कोई भी इस बात की तुलना करता है की विदेशी सांसदों को भारतीय सान्ददों की तुलना में अधिक वेतन और सुविधाएं मिलती है, वो ये भी तो सोचें, विदेशों में वेतन उअर सुविधाएँ ही मिलाती हैं, और यहाँ वेतन और सुविधाएं भी मिलती हैं, पहले हो आय के दूसरे स्रोत आते हैं……

    deepaksrivastava के द्वारा
    June 25, 2010

    पाण्डेय जी उस लेख में एक जगह एक बहुत ही आदरणीय सांसद का उल्लेख कर कहा गया है की “उनकी बात छोड़ दीजिये वो स्वंत्र संग्राम सेनानी थे” तो क्या स्वंतंत्र संग्राम सेनानियों के आदर्शों पर भी हमें पुनर्विचार करना पड़ेगा. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद पाण्डेय जी.

pankaj sandilya के द्वारा
May 26, 2010

इस विषय पर तो पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है और मुझे लगता है की आपसे पूरा देश सहमत होगा.

    deepaksrivastava के द्वारा
    June 25, 2010

    परन्तु आपके आलावा किसी और की प्रितिक्रिया प्राप्त नहीं हुई.


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