सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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अभिलाषा

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मेरी ये अभिलाषा है,
कि अपनी दोनों मुठ्ठियों में
एक मुठ्ठी आसमान भर लूं.
मेरी ये अभिलाषा है,
कि आकाश को खींचकर,
मैं धरती से उसका मिलन कर दूं.
मेरी ये अभिलाषा है,
कि अब की चौमासे में,
पहली बूँद के साथ मैं बरसूँ.
मेरी ये अभिलाषा है,
कि चाँद पर पहुंचकर,
उसकी कालिमा को धो दूँ
मेरी ये अभिलाषा है,
कि इस बार पूरनमासी को
बनकर अमृत मैं बरसूँ.
मेरी ये अभिलाषा है,
कि अबकी बसंत में ,
बेला के फूलों की तरह महकूँ.
मेरी ये अभिलाषा है,
कि फूलों के चटकने पर,
बन-कर सुगन्धित पराग बिखरूं.
पर क्या
मैं मुठ्ठी में भर सकता हूँ आसमान?
या फिर
धरती, आकाश का मिलन करा सकता हूँ?
क्या पावस में बरस सकता हूँ मैं?
या फिर,
चाँद पे जा सकता हूँ?
या बरस सकता हूँ मैं बनकर अमृत?
क्या
बेला के फूल और पराग-सी
सुगन्धि बिखेर सकता हूँ?
क्या
मैं अपनी अभिलाषाओं के पंख लगाकर,
अपने इस मनोहारी स्वप्न को
एक धरातल दे सकता हूँ?

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepaksrivastava के द्वारा
July 9, 2010

.

aditi kailash के द्वारा
June 20, 2010

दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा…….चाँद तारों को छूने की आशा…..आसमानों में उड़ने की आशा …..अगर मन में दृढ संकल्प है तो आप अपनी आशाएं जरुर पूरी कर सकते हैं………हमारी शुभकामनायें…….

    deepak srivastava के द्वारा
    June 21, 2010

    आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत धन्यवाद अदिति जी. अच्छी प्रतिक्रियाएं संकल्पों को दृढ अवश्य करती है. shukriya.

chaatak के द्वारा
June 19, 2010

दीपक जी, अच्छी प्रस्तुति है आपकी. ईश्वर आपकी अभिलाषा पूर्ण करे. शुभकामनाएं |

    deepak srivastava के द्वारा
    June 20, 2010

    धन्यवाद, चातक जी. आपकी शुभकामनायें मेरे लिए अमूल्य हैं.

Nikhil के द्वारा
June 19, 2010

आपकी अभिलाषा जरुर पूरी होगी दीपकजी. बहुत अच्छी रचना.

    deepak srivastava के द्वारा
    June 19, 2010

    धन्यवाद. आपकी प्रतिक्रिया से मुझमें नवीन उत्साह का संचार हुआ है.

Arunesh Mishra के द्वारा
June 19, 2010

सुन्दर कविता दीपक जी

    deepak srivastava के द्वारा
    June 19, 2010

    आपको पसंद आयी अरुणेश जी मेरे हौसले बुलंद हुए.


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