सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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पत्थर-वाजी का ख़ूनी खेल

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भैया ये एम्.एस.टी. कितने की बनेगी, रामपुर-मुरादाबाद की. मैंने पैसे निकल कर थमा दिए, बुकिंग क्लेर्क को उसने पांच मिनट में ही एम्.एस.टी बना कर थमा दी. अरे भैया ट्रान्सफर हो गया है और जब तक ढंग की रिहाइश ना मिल जाए तब तक तो अप-डाउन ही करना पड़ेगा. रोज-रोज टिकेट खरीद कर यात्रा तो बजट ही बिगाड़ देगी. ट्रेन में अभी समय था, सोचा की अख़बार पढ़कर ही वक़्त बिताया जाये. कैफेटेरिया में चाय का आर्डर देकर अख़बार पर सरसरी निगाह डालते-डालते एक समाचार पर निगाह टिक गयी.

आतंकियों ने पुलिस और प्रशाशन को तंग करने का नया तरीका खोज लिया था, पत्थर-वाजी. कुछ गुमराह युवक आतंक फैलाने के लिए अचानक पत्थर-वाजी करने लगते हैं. पता नहीं ऊपरवाला कब धरती के स्वर्ग कश्मीर को पहले जैसी शांत खूबसूरती और पहले जैसी खूबसूरत शांति लौटाएगा? पर मुझे विश्वास है कि ऐसा एक दिन होगा जरूर. न्यूज़ को पढ़ते-पढ़ते मैं कहीं खो सा गया, तब तक उद्घोषणा सुनायी दे गयी, इश्वर का शुक्रिया अदा किया कि ट्रेन राईट टाइम थी, नहीं तो पता नहीं कब तक और इंतज़ार करना पड़ता. अख़बार को लपेट कर ट्रेन वाले प्लेट-फॉर्म की ओर चल दिया. प्लेट-फॉर्म तक पहुँचते-पहुँचते ट्रेन आ चुकी थी. पर ये क्या, ट्रेन में तो गज़ब की भीड़ थी. भीड़ को देखकर ही पसीने-पसीने हो गया. बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटा कर और इस आस में कि घर टाइम से पहुँच जायेंगे, किसी तरह एक डिब्बे के गेट पर खड़े होने भर की जगह मिल गयी, और एडजस्ट होते-होते ट्रेन चल पडी, सभी ने रहत की साँस ली. ट्रेन धीरे-धीरे रेंगनें लगी थी, तभी एक सज्जन दौड़ते हुए आये और लटकने के बाद वहीँ गेट पर खड़े हो गए. मैंने उनके लिए जगह कर दी हालाँकि झूंठ नहीं बोलूँगा मानव स्वभाव-वश मन में एक बार विचार आया था कि उन महाशय को डिब्बे में घुसने ना दूं कारण एक तो जगह की निहायत ही कमी थी, सर के ऊपर बैग लादे थे तो पैरों की पोजीसन भी ऐसी थी कि डर था कि पैर हटाया तो उस जगह को कोई अपने पैरों से घेर लेगा. इसके अलावा उन महाशय ने हवा को भी रोक दिया था. सोने पे सुहागा वो पंखे थे जो किसी अड़ियल टट्टू से स्थिर सभी मुसाफिरों को मुंह चिढ़ा रहे थे. लोगों का धैर्य आक्रोश की बाउंड्री-लाइन पर खड़ा था, बिलकुल तराजू की तरह बैलेंस कि एक चिड़िया का पंख भी दूसरी तरफ रख दो तो बैलेंस बिगड़ जाए. पर मेरे अन्दर के सज्जन मानुष ने उन महाशय को खुद तो जगह दी ही, लड़-भिड़ कर और भी जगह करवा दी. अब कुछ लोग तो उन बेचारे यात्रियों को ही कोसने लगे थे जो बेचारे अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में अमृतसर या लुधियाना में पड़े थे और अब अपने घर सहरसा या और कहीं लौट रहे थे. मेरा सफ़र चूँकि सिर्फ उनतीस किलो-मीटर का था मुझे ज्यादा चिंता नहीं थी, मुझे पता था कि सिर्फ आधे-एक घंटे का सफ़र है अतैव मैं बिना किसी डिस्कसन में पड़े हुए अपनी मंजिल का इंतज़ार कर रहा था. ट्रेन प्लेट-फॉर्म को पीछे छोड़कर बढ़ चुकी थी और कटघर पहुँचने वाली थी की अचानक वो सज्जन एकदम से चीख पड़े और अपनी कोहनी को पकड़ कर बैठ गए और उनके साथ ही बैठा एक युवक भी एकदम अपने मुंह को छिपाकर पीछे की ओर घूमा. मुझे कुछ माजरा समझ नहीं आया अतैव मैंने उस युवक से पूछा की क्या हुआ? प्रत्युत्तर में जो ज्ञात हुआ उससे मुझे उस अख़बार की वो खबर की याद आ गयी जिसमें विवरण था की कैसे आतंकियों ने सुरक्षा-बलों को कश्मीर घाटी में परेशां करने के लिए युवकों को गुमराह कर उनका प्रयोग पत्थर-वाजी करने के लिए किया था, और मैं ये सोच रहा था की यहाँ इन युवकों को कौन गुमराह कर रहा था. उन महाशय की कोहनी फूट कर लहू-लुहान हो चुकी थी और दुसरे युवक के हाथों में एक पत्थर था जो उन पत्थरों में से एक था जो नीचे खड़े युवकों ने चलती ट्रेन पर फेंका था, जो अगर धोखे से कहीं सर या आँखों में लग जाता तो शायद वो महाशय और ज्यादा मुसीबत में पद जाते. उनकी कोहनी से खून निकल रहा था और चोट के कारण उनको चक्कर भी आ रहे थे. हम लोगों ने किसी तरह उनको संभाल-कर गेट से पीछे खींचा और थोड़ी जगह बनाकर एक कपडे से उनका खून रोका. दरवाजे और आस पास खड़े सभी लोग ये सोच-कर दहशत में आ गए थे कि वो पत्थर उनको भी लग सकता था.

मैं ये विचार कर रहा था कि आखिर उन नवजवानों को ट्रेन पर पत्थर बरसा कर क्या हासिल हुआ होगा, इसके विपरीत इस पत्थर की वजह से किसी की भी जान जा सकती है, कोई भी अचानक चले पत्थर से चोट खाकर ट्रेन से नीचे गिरकर अपने प्राणों से हाथ धो सकता है. ट्रेन में बैठे एक युवक ने बताया कि ये इन नामुराद युवकों जो कि कम से कम बीस साल के रहे होंगे, लगभग रोज ही इसीतरह वहां से गुजरने वाली ट्रेनों पर पत्थर-वाजी करते हैं. मेरे मस्तिष्क में अखवार की वो खबर तैर गयी – “कश्मीर में पत्थर-वाजी – आतंकवादियों का एक नया शगल”.

यदि आप भी कभी मुरादाबाद से रामपुर के बीच सफ़र करें तो ध्यान रखें कि कभी दरवाजे पर ना खड़े हों क्योंकि कभी भी एक बड़ा सा पत्थर अचानक आपको चोट पहुंचा सकता है. ये शैतान-पुत्र तो अपने खूनी खेल को बंद करने से रहे.

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sumityadav के द्वारा
July 16, 2010

खून बहाना तो आजकल एक शगल, जूनून, पागलपन सब कुछ हो गया है। कोई शौक के लिए  पत्थरबाजी कर खून बहा रहा है, कोई नौजवानों को भड़कानें और स्वार्थसिद्धि के लिए पत्थर बरसा रहा है तो कोई चंद पलों के भावावेश में आकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसा रहे हैं। अच्छे और समाज को आईना दिखाने वाले लेख के लिए बधाई।

    deepaksrivastava के द्वारा
    July 17, 2010

    शौक के लिए पत्थर बरसाना और बो भी जब ये मालूम हो कि इससे किसी की जान भी जा सकती है, क्या ये मानसिकता किसी सायको-किलर कि मानसिकता को प्रतिबिंबित नहीं करती. सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद सुमित जी.

parveensharma के द्वारा
July 16, 2010

घाटी में आजकल खूब पत्थर चल रहे हैं…आये दिन पुलिस वालों, या किसी समाजसेवी पर भी पत्थर बाजी के समाचार आते रहते हैं…केवल मुरादाबाद-रामपुर ट्रेन ही क्यों….अनेक रेल गाड़ियों पर समाज कंटक पथराव करते रहते हैं…ऐसा लगता है कि हम वापस पाषाण युग में लौट रहे हैं…अच्छा विषय…बधाई…

    deepaksrivastava के द्वारा
    July 17, 2010

    ये लोगों के दिमाग पर पत्थर पद गए जो उनके हाथों में आकर किसी पर भी बरसने लगते हैं. प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया प्रवीण जी.

Nikhil के द्वारा
July 16, 2010

दीपक जी, आपने किस टोपिक पर ये लेख लिखा, हो सकता है लोगों को भ्रमित कर जाये. लेकिन एक बात तो साफ़ झलकती है आपके लेख से, आज के इन्सान को खून बहाने के लिए सिर्फ एक बहाने की ज़रूरत है, कभी धर्म के नाम पर, कभी कर्म के नाम पर तो कभी सिर्फ मज़े के लिए. अच्छा लिखा है आपने, लिखते रहिये.

    Deepak Srivastava के द्वारा
    July 17, 2010

    मानविक संवेदनाओं का पतन इस कदर हो चूका है, या ये कह सकते हैं कि आस-पास इतना खून-खराबा देख रहे हैं लोग कि खून बहते देखकर अब लोगों का जी नहीं मचलाता, उन्हें उलटी महसूस नहीं होती बल्कि अब खून बहता देखकर या तो लोगों को कुछ महसूस नहीं होता या फिर उन्हें इसमें मज़ा आता है. मुझे तो लगता है कि लगातार रिश्ते खून (खून रिश्तों का भी) के साथ हमारी इमोशनल फीलिंग्स भी बह जा रहीं है. जरूरत है इनको रोकने के लिए छोटे – छोटे संवेदी बांधों की. आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, निखिल जी.

roshni के द्वारा
July 15, 2010

दीपक जी आपका लेख पड़ा, पहले मुझे लगा की ये रेलवे पे आधारित है.. फिर लगा की रेल मई सफ़र करने वालों की रोज़ की अप्पधापी पर है , पर अन्त में ये निष्कर्ष निकला की मुरादाबाद से रामपुर तक सफर ध्यान से करना चाहिए , बुरा न मानियेगा अगर किसी एक टोपिक पर रहता तो बहुत अच्छा लगता…

    Deepak Srivastava के द्वारा
    July 17, 2010

    रोशनी जी मैं कोई बहुत बड़ा लेखक तो हूँ नहीं, हो सकता है कोई सुघड़ लेखक इस घटना से साछात्कार करता तो लेखन के नियमों का पालन करते हुए रोचक तरीके से इसे प्रस्तुत करता. मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा और भविष्य में कोशिश रहेगी कि इस तरह लिखा जाये कि पढने वालों को टोपिक भटकता हुआ ना लगे. एक ईमानदार प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

aakash1992 के द्वारा
July 15, 2010

SAHI KAHA AAPNE JAMINI HAKIKAT KO DIKHAYA HE

    deepaksrivastava के द्वारा
    July 15, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आकाश जी.


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