सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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जब मुस्कान छिटककर कोई

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झंकृत होते हैं सितार कई,
रचता है इन्द्रधनुष कोई,
मन भी होकर उड़न-खटोला,
पेंगे भर लेता है कई.

कलम होकर काव्यमय स्वयं ही
विखेरती रोशनाई है,
डूब चटक रंगों में कूंची ने
फिर से ली अंगड़ाई है.

सूखे झरने फिर से पाकर
वर्षा-जल को, हर्षाये हैं.
हरकारे, बंजारे और भंवरे
मधुर संदेशे लाये हैं.

मौसम पीतवर्ण त्याग कर
नूतन परिधान पहिरता है,
आँखों के कोठरोँ को अब
कुछ भी नहीं अखरता है.

चारों ओर कोई ताजगी
बिखरी पसरी लगती है,
बोझिल, गर्दो-गुबार की दुनिया
निखरी सुथरी लगती है.

प्रश्नों का मायाजाल है टूटा
उत्तरों का भी टोटा है,
निषंग भाव से घूम रहा मन
महल, बुर्ज, परकोटा है.

जीवन की परिभाषा सजकर
नयी-नयी हो जाती है
जब मुस्कान छिटककर कोई
मन-मंदिर में बस जाती है.

दीपक श्रीवास्तव

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manu के द्वारा
July 30, 2010

beautiful poem!

    deepaksrivastava के द्वारा
    July 31, 2010

    thanks for your valuable comments. deepak srivastava


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