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मोदी, अमिताभ बच्चन और शेष दुनिया

Posted On: 25 Oct, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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यदि मोदी धर्म निरपेछ लगते हैं अमिताभ को, तो क्या हुआ. इस देश में धर्म निरपेछ और सांप्रदायिक कौन है, इसकी परिभाषा विगत कुछ वर्षों में इस तरह से गढ़ी गयी है कि सर्वाधिक सहनशील सनातन धर्म के पछ में कही गयी कोई भी बात, भले ही उस बात से किसी अन्य पंथ, सम्प्रदाय का कोई लेना देना हो या ना हो, सांप्रदायिक है और उसका विरोध सेक्युलरिज्म. २३ अक्टूबर को अपने ब्लॉग में राजीव शुक्ल बिलकुल सही लिखते हैं कि अमिताभ के मोदी पर दिए गए सीधे सादे बयान के राजनीतिक निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं और बेमतलब इसे तूल दिया जा रहा है. वह सही कहते हैं कि विषम परिस्थितियों में गुजरात का कांटों भरा तख्त मोदी ने संभाला था और उन्होंने गुजरात के इतिहास में विकास के नए आयाम स्थापित किए. आज गुजरात प्रान्त देश का सर्वाधिक विकसित प्रान्त बनने की ओर तीव्रता से अग्रसर है, जिसका फायदा प्रदेश की पूरी जनता को मिलेगा. किस प्रान्त की जनता नहीं चाहेगी कि उसे ऐसा विकासोन्मुख मुख्यमंत्री मिले. वह फिर लिखते हैं कि तीसरे विधानसभा चुनाव में भाजपा के किसी स्टार प्रचारक को बुलाए बिना सत्ता का मार्ग उन्होंने अपने लिए प्रशस्त किया, अगर मोदी की छवि पर इतने बदनुमा दाग होते तो उनका कांग्रेस के गढ़ में जीतना संभव नहीं होता. यह सच है कि दंगे किसी भी प्रान्त के शरीर पर एक घाव के समान होता है, परन्तु क्या इस घाव को कुरेद कुरेद कर नासूर बनाना उचित होगा. लेकिन ऐसा किये बिना राजनीतिक रोटियां भी तो नहीं सिक सकतीं. क्या दंगों का बार-बार स्मरण लोगों में नफरत की अभिव्रधि नहीं करता और एक मायने में साम्प्रदायिकता की पछ्धारिता का बोध नहीं कराता. यहाँ पर राजीव जी द्वारा अपने ब्लॉग “सत्य कहने का दुस्साहस किया बच्चन ने”, में उल्लिखित राहत इन्दौरी के शेर को फिर से पेश करना चाहूंगा — ‘यारों हमी बोला करें दिल्ली से अमन की बोली, कभी तुम लोग भी तो लाहौर से बोलो’. क्या ऐसा कथन साहस होगा या फिर दुसाहस ? सांप्रदायिक होगा या धर्म निरपेछ ? इसका उत्तर हमें खोजना होगा और वो भी बहुत ही जल्दी नहीं तो यह छद्म सेकुलरिस्म बनाम नॉन-सेकुलरिस्म के आतंकवाद से हमारी रछा कोई नहीं कर सकेगा. जागो भारत के प्रबुद्ध जन मानस, समझो क्यों हर बात को तूल दिया जाता है और क्यों कोई मुद्दा वक्त के कब्रस्तान में दफ़न कर दिया जाता है. जागो, समझो और सही बात को सही और गलत को गलत कहने वालों का साथ देने का साहस पैदा करो. हाँ, परन्तु सब कुछ शांति पूर्ण तरीके से धीरे धीरे विकसित करो और अपने देश को विकास की उस ऊंचाई तक ले चलो जिसकी चाहत हर भारतवासी के मन में होती है. एक विकसित और सही मायने में धर्म निरपेछ राष्ट्र ही स्थाई होता है. आज सही मायने में हमें धर्म निरपेछ होने की जरुरत हैं न कि गुमराह होकर छद्म सेकुलरिस्म का समर्थन करने की. जरुरत है इस जज्बे को पैदा करने की कि “हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं.” जरुरत है इस अभियान की, अपने देश को गौरवशाली बनाने के लिए.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Parveen Sundriyal के द्वारा
November 14, 2010

बताइए कितने गुजराती मुसलमान गुजरात छोड़ हर चले गए और कितने कश्मीरी हिन्दू अपने घरो में लौट पाए है. न्यूज़ चैनल में सुनंदा पुष्कर का घर देखा था जिसे मुसलमानों ने जला दिया और श्रीनगर के मंदिर जहा औरंगजेब के ज़माने में भी पूजा होती थी आज धर्मनिरपेक्ष सरकार के समय में नहीं हो पाती और वो सब कश्मीरी मुसलमान बिचारे है. देश में दो ही साम्पर्दायिक तत्त्व है एक तो मोदी और दूसरा भारतीय सेना और जो इनका साथ देता है वो भी, चाहे वो अमिताभ बच्चन ही क्यों ना हो.

    November 14, 2010

    परवीन जी, आपकी प्रतिक्रया पर तो तालियाँ बजाने को जी चाहा. देश में दो ही साम्पर्दायिक तत्त्व है एक तो मोदी और दूसरा भारतीय सेना और जो इनका साथ देता है वो भी, चाहे वो अमिताभ बच्चन ही क्यों ना हो. बिलकुल सही कहा आपने. धन्यवाद.

K M MIshra के द्वारा
October 26, 2010

आदरणीय दीपक जी सादर वंदेमातरम ! आपने भली प्रकार पाखंडी धर्मनिरपेक्षवादियों की खाल खींची । भेड़ की खाल में सब भेड़िये बैठे हैं । लेख के लिये बहुत बहुत आभार । एक जरूरी सूचना भी देना चाहता हूं छद्म नाम से टिप्पणियां करने वालों की । इधर सैयद अलीशाह गिलानी और अरूंधती राय के बीच हुये संसर्ग से एक और राष्ट्रद्रोही कूलबेबी ने जन्म लिया है । कश्मीर पर मेरे लेख ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ पर आकर उन्होंने भारतीयों को अपनी अमूल्य राय दी । नीचे दे रहा हूं । Amazing ! Kashmeer is not your matter……..It is matter of those who stay in kashmeer.I read here your comments and alike you buddies,But It appears to be double standard in your mind,what have been done by Indira gandhi is right? then you have to accept Mahmood Ghaznavi as a Great Reformer because he united India at time the various kings here fighting for their own throne….

    October 31, 2010

    गजनी के आधुनिक अवतार पकिस्तान के समर्थक भारत में बहुत मिल जायेंगे. एक ऐसा देश जहाँ किसी प्रकार की कोई बंदिश ना हो दुश्मनों के समर्थन में खड़े लोगों को कोई सजा न मिलती हो. ऐसी बातें सुने देना पढने को मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं है. हमारा लोकतंत्र सहनशील सनातन धर्म के साथ मिलकर एक अनोखा विश्वास पैदा करता कि हमारी संस्कृति, हमारे विश्वास को कोई नहीं डिगा सकता. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

October 26, 2010

दीपक कुमार जी सही कहा आपने…… वास्तव में एक कहावत सुनी थी शायद गलत याद हो…… की हाथी के पैर पर सब का पैर….. उसी तरह श्री अमिताभ बच्चन साहब भी छोटी राजनीती करने वाले लोगों के लिए सीढ़ी का काम करने लगे हैं……… उनके खिलाफ जहर उगल कर राज ठाकरे मराठी होने का दंभ भरने लगते हैं……. अमिताभ जी की निजी राय को तूल देना जबकि वो कोई राजनैतिक मंच पर न हो………….. व्यर्थ है………. अच्छा प्रयास……. हार्दिक बधाई………


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