सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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काश! मैं पाषाण होता

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काश! मैं पाषाण होता,
मेरे ह्रदय पर कोई पाषाण तो नहीं होता,
काल के आघात से विखर जाता,
वेदना से छटपटाकर नहीं रोता.
पूष की ठिठुरन होती,
या जेठ की अंगार तपन,
श्रावण का सत्कार होता,
या होता पतझड़ का रुदन,
सब कुछ होता जाना पहचाना,
इस धुंध में भटककर नहीं खोता.
काश! मैं पाषाण होता.

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pooja के द्वारा
April 21, 2011

कभी हम जीवन में बीते दीनो को उनके एक एक पल के साथ याद करते है क्या नहीं हर नए दिन में पुराने दिनों की छोटी छोटी अछएयो, खुशियों व् दुखो को याद नहीं करते क्या यह सच नहीं है लेकिन फिर भी हम जीवन की इस सचाई को भूलकर नए दिन की छोटी छोटी बातो से इतने दुखी हो जाते है कि अपनी ज़िन्दगी कि अहमियत को भूल जाते है

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 14, 2010

सुन्दर अभिव्यक्ति……….. हार्दिक बधाई…………..


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