सीधा, सरल जो मन मेरे घटा

सागर में एक बूँद

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ढूंढता है रात भर ......... रोटियाँ

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ढूंढता है रात भर,
एक छत खुले आकाश में,
कानों में बजती अनवरत,
शहनाईयां बस आस की,
और बीनता है दौड़ सिक्के,
तारों की बारात में.

कुछ नहीं दीखता
सपने में गरीब को,
रोटियाँ सूखी हुईं,
नमक फीका दाल में,
और थोड़ी सी भी नहीं,
सब्जी है नसीब को.

कोठरों में आँखों के
सपने कहाँ गरीब के,
रात-दिन है जोतता,
सेंकता कर सौ जतन,
छूटतीं फिर भी मगर,
हाथों से रोटियाँ.

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 19, 2010

बहुत ही सुन्दर कविता । तथापि सपनें भले ही मालपुए के हो वास्‍तव में जब रोटियां नसीब में ना हो तो ……….। अरविन्‍द पारीक

    November 19, 2010

    तब तो बेचारा गरीब और परेशान रहेगा. मालपुए की कल्पना तब करे जब उसने देखा हो. प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद, भाई जी.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 16, 2010

सुन्दर प्रस्तुति………… एक दिन हीन की दयनीय दशा का मार्मिक वर्णन………….. हार्दिक बधाई…….


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